||अथ गुरु देव का अंग ||                                                 

इस प्रकरण में विशेष रूप से सद्गुरु की महिमा का वर्णन किया गया हैं जिसे जानकार जीव कल्याण का भागी बन जाता हैं ।

 

गरीब प्रपट्टन  परलोक है, जहाँ अदली सद्गुरु सार |
भक्ति हेत से उतरे, पाया हम दीदार ।। १ ।।

अर्थ---पट्टन (पत्तन ) नाम शहर का हैं प्र यहाँ पर उपसर्ग हैं | अर्थात उत्तम नगर (शहर ) जो विशेष लोक सतलोक से भी ऊपर कहलाता हैं । यहाँ अदली (न्याय कर्ता ) न्यायकारी सद्गुरु जी अपना सार अपनी श्रेष्ठता व शुद्ध स्वरूपता लिए हुए विराजमान हैं ।उस उत्तम लोक से सद्गुरुजी हंसी, स्वच्छ ह्रदय, संतो या भक्तो में प्रेम भक्ति को द्रढ़  करने के लिए इस लोक (म्रत्यु लोक) में अवतरित हुए।जिनका दर्शन हमने भव-बंधन से छुड़ाने वाला छुडानी धाम में पाया । 
 
गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या, अलल पंख की जात ।
काय माया न ऊँहा, नहीं पिंड नहीं गात ।। २ ।।

अर्थ---यहाँ महाराज जी कह रहे हैं की हमें सद्गुरु कबीर साहिब जी ऐसे मिले हैं जैसे अलल (अनिल) पक्षी अपने बच्चे को मिलता हैं ।स्वच्छ एवं शुद्ध स्थान आकाश में ही मिलते हैं , वहां पर ब्रम्ह लोक या गुरु धाम में न पांच भौतिक शरीर हैं न संसारिक माया जंजाल हैं न ही और कोई शरीर का पिंड अंग जड़ (आकार ) हैं और न ही गात शरीर वाला अंगी चेतन हैं । अर्थात पृथ्वी, जल,तेज़ वायु , आकाश इन पञ्च भूतो की कोई सृष्टि है। किन्तु सच्चे गुरु अपने सच्चे शिष्य को मुक्ति देकर अपने स्वरूपानंद में मिला लेते हैं  अर्थात अलल पक्षी की भाँती सुरती शब्द में ही विचरण करते हैं।

गरीब ऐसा  सतगुरु हम मिल्या, उजल  हिरंबर आदि ।
भलका ज्ञान कमान का घालत हैं सर सांधि ।। ३ ।।

अर्थ---महाराज जी कहते हैं की हमें ऐसे सद्गुरु मिले हैं जो उज्जवल प्रकाश स्वरुप, हिरम्बर  हिरण्यमय स्वर्ण के सामान शुद्ध ज्ञान प्रकाश स्वरुप सबके आदि मूल कारण हैं । उन्होंने ज्ञान रुपी कमान पर भलका = तीर रुपी फल (मुखी) को चढ़ा कर एसा सांध कर बाण मार दिया कि  अन्धकार रुपी जीव के सब भरम कर्मो को नष्ट करके ह्रदय में शुद्ध प्रकाश उत्पन्न कर दिया ।

गरीब ऐसा  सतगुरु हम मिल्या,सुन्न विदेशी आप ।
रोम रोम प्रकाश है, दीना अजपा जाप ।। ४ ।।

अर्थ---महाराज जी कह रहे हैं की हमें ऐसे सद्गुरु प्राप्त हुए हैं जो सुन्न (शून्य ) निष्क्रिय ब्रम्ह (अफुर) "सतलोक " देश के स्वयं रहने वाले हैं । वहाँ  कोई चेष्टा इच्छा नहीं है । उनके शरीर का रोम रोम प्रकाशमान सुन्दर है। मुझे सद्गुरु जी ने अजपा जाप का उपदेश दिया अर्थात ऐसा गुरु मंत्र दिया जिसकी साधना एवं अभ्यास से स्वयं बिना जपे जाप होता रहता है और उस अजपा-जाप से जापक के रोम रोम से नाम की ध्वनी निकलने लगती है ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या, मगन किये मस्ताक।
प्याला पाया प्रेम का गगन मंडल गर गाप ।। ५ ।।

अर्थ---महाराज गरीब दास जी कह रहे हैं की हमें ऐसे सर्व शक्तिमान सद्गुरु मिले और उन्होंने अपने चरणों में मुझे ऐसा लगाया एवं अनुरक्त किया की हम संसार को भूल कर मस्त हो गए और हमें ऐसा प्रेम का प्याला पिला दिया कि हम दशवें द्वार में लीन हो गए । अर्थात सर्वव्यापी आकाश के सामान प्रत्येक प्राणी में अपना स्वरूप व गुरु स्वरूप का दर्शन करने लगे ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या,सिंध सुरति  की सैन ।
उर अंतर प्रकाशिया , अजब सुनाये बैन ।। ६ ।।

अर्थ---महाराज जी कहते हैं की हमें ऐसे सद्गुरु मिले कि उन्होंने जीव ब्रम्ह की एकता अनुभव एवं सुरति  शब्द के मेल से ध्यान द्वारा अज्ञानता का अंधकार मिटाकर अंतःकरण प्रकाशित कर दिया अर्थात सुरति  और शब्द इन दोनों के मेल से ही प्राप्त होगा ऐसा  संकेत दे रहे हैं । साथ ही हमें अपना विचित्र अमृतमय ब्रम्ह का उपदेश रुपी प्याला भी पिला दिया कि हमारा ह्रदय प्रकाशित हो गया ।अज्ञान रुपी अन्धकार नष्ट हो गया तथा ब्रम्हाकार वृत्ति हो गई ।

 

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या,सुरति सिन्धु की सैल ।
बज्र पौल पट खोलकर , ले गया झीनी गैल ।। ७ ।।

अर्थ---यहाँ महाराज जी कह रहे हैं कि हमें सद्गुरु कबीर साहिब जी महाराज जी मिले सुरती स्वरूपी सागर के किनारे पर , बजर के सामान जो दशवे द्वार की पौल (पौली) ड्योढ़ी, दरवाजे के पट (फाटक) कठिन दरवाजो के किवाड़ो को खोल दिया और झीनी=सूक्ष्म मार्ग या रास्ते से हमें दशवे द्वार में प्रवेश करवाकर अपने निज धाम में ले गए । अर्थात अपने में लीन कर लिया ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या,सुरति सिन्धु के तीर ।
सब संतन सर ताज हैं, सद्गुरु अदल कबीर ।। ८ ।।

अर्थ---सदगुरु जी कहते हैं कि हमें कबीर साहिब जी (संत मत के आदि प्रवर्तक सबके शिरोमणि गुरु ) सुरति शब्द की संधि में प्राप्त हुए । अर्थात ऐसे न्यायकर्ता पारब्रम्ह परमेश्वर कबीर साहेब ध्यानावस्था में प्राप्त हुए ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या, सुरति सिंध के मांहि ।
शब्द स्वरूपी अंग है,पिंड प्राण नहीं छाँही ।। ९ ।।

अर्थ---प्रथम चरण उपरोक्त ही हैं । दुसरे चरण का अर्थ हैं सुरती और शब्द की संधि के बीच अर्थात  ध्यान योग में सद्गुरु जी का शब्द स्वरूप प्राप्त होता हैं । उनके न तो पिंड (शरीर) हैं ना ही प्राण हैं और ना ही छाया हैं । अर्थात वह निराकार शुद्ध ब्रम्ह स्वरुप हैं अर्थात पंच भूति शरीर नहीं हैं अपितु तेजोमय शरीर है।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या, गल्ताना गुलजार।
वार पार कीमत नहीं , नहीं हल्का नहीं भार ।। १० ।।

अर्थ---हमें ऐसे सदगुर मिले जो सबमें (गलतान) लीन होकर खिले हुए पुष्प के सामान शोभा दे रहे हैं । अर्थात पुष्प की गंध के सामान निराकार भी हैं और पुष्प रूप से साकार भी हैं ।उसका ना तो कोई वार हैं और ना ही कोई पार, उसकी कोई छोर सीमा नहीं मिलती है। उसकी ना तो कोई कीमत हैं वह अमूल्य निधि हैं ।वह सद्गुरु पारब्रम्ह स्वरूप हैं ना हल्का हैं ना भारी हैं अर्थात सामान रूप से व्यापक हैं। हल्कापन वायु धर्म और भारीपन पृथ्वी धर्म उसमे नहीं हैं ।

 

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,सुरति सिन्धु के मंझ ।
अंड्यो आनंद पोश है, बैन सुनाये कुञ्ज ।। ११ ||

अर्थ---हमें सद्गुरु सुरति ध्यान (वृति) रुपी सागर (मंझ) बीच में ऐसे मिलकर रक्षा की जैसे कुंज (पक्षी) अपने अन्डो का सुरति  के द्वारा अथवा बैन या शब्द (कुरलाहट) सुनाकर आनंद से पोषण करता है।
उसी प्रकार सद्गुरु महाराज जी भी अपने से बिछड़े हुए हंसो, सन्तो,सेवकों को अपने शब्द उपदेश द्वारा या अपनी कृपा द्रष्टि द्वारा उनका भरण-पोषण एवं कल्याण करते है। अर्थात पुनः अपने धाम में लीन  कर लेते हैं।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,सुरति सिन्धु के नाल ।
पीताम्बर ताखी धर्यो , बानी शब्द रिसाल || १२ ||

अर्थ---सुरति शब्द की संधि में हमें ऐसे  सद्गुरु मिले जिन्होंने अपनी ताखी (शरीर) पर पीताम्बर धारण कर रखा है अर्थात पीत वस्त्र धारी सदगुरुदेव दर्शन दे रहे हैं । रिसाल = रस+आलय ( रस से भरा हुआ आलय = घर) प्रेम रुपी रस से भरे हुए शब्द हमें सुनाई दे रहे हैं। अर्थात सुद्ध बुद्ध प्रकाश आनंद स्वरूप ब्रम्ह का उपदेश दिया एवं आनंद को देने वाली वाणी के द्वारा शब्द ब्रम्ह का उपदेश किया ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,सुरति सिन्धु के नाल ।
गमन किया परलोक से अलल पंख की चाल ।। १३ ।।

अर्थ---सुरति रुपी सागर में अर्थात सुरति शब्द की संधि में हमें ऐसे सद्गुरु मिले जिन्होंने अपने पास बुला लिया एवं अपने समान बना लिया।
जैसे अलल पक्षी ध्यान के द्वारा बच्चे को ऊपर के वायु मंडल में खींच लेता हैं ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,सुरति सिन्धु के नाल।
ज्ञान,जोग और भक्ति सब , दीन्हीं नजर निहाल ।। १४ ।।

अर्थ---हमें ऐसे सद्गुरु महाराज मिल गए जिन्होंने सुरति = शब्द की संधि (नाल=साथ) के द्वारा उनहोंने ज्ञान योग और भक्ति योग यह सब दया द्रष्टि मात्र से देकर निहाल (कृतार्थ) कर दिया ।

गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,बे प्रवाह अबंध ।
परम हंस पूरण पुरुष , रोम रोम रवि चंद  ।। १५ ।।

अर्थ---महाराज जी कहते हैं की हमको सद्गुरु जी पार ब्रम्ह परमेश्वर ऐसे मिले कि जिनको किसी की परवाह चिंता नहीं हैं ।अपने में स्थित हैं उनके ऊपर किसीका शासन व बंधन नहीं है। भव, बंधन अशक्ति से रहित हैं जो हंस के समान स्वच्छ आचार विचार वाले परमहंस (परम  ब्रम्ह ) सद्गुरु हैं जो सब प्रकार के आनंद से परिपूर्ण है। जिनके अंगो में रवि (सूर्य) चंद्रमा भी चमकते हैं ।


गरीब ऐसा सतगुरु हम मिल्या ,है ज़िंदा जगदीश ।
सुन्न बिदेशी मिल गया,छतर मुकुट हैं शीश ।। १६ ।।

अर्थ---हमको ऐसे  सद्गुरु मिले जो जिन्दा ( मुसलमानों फकीरों में जो ज्ञानवान फ़कीर होते हैं । उनका विशेष प्रकार का भेष ) यहाँ सद्गुरु गरीबदास जी महाराज कबीर दास जी को जिन्दा शब्द से संबोषित करते हैं क्योंकि वो जिन्दा फकीरों जैसा भेष धारण करते थे अथवा ज़िंदा ज्योति स्वरूप हैं । वह जगत को ईश्वर सुन्न विदेशी ( अफुर देश शब्द ब्रम्ह में रहने वाले ) सिर पर छत्र और मुकुट धारण किये हुए हैं।

गरीब  सद्गुरु के लक्षण कहूँ , मधुरे बैन विनोद ।
चार वेद षठ शास्त्र , कहाँ अठारा बोध ।। १७ ।।

अर्थ---सद्गुरु जी परमात्मा की स्तुति करते हुए व उनके प्रति श्रधा दर्शाते हुए उस सद्गुरु के लक्षण महिमा का वर्णन करते हैं । महाराज जी कहते हैं की मैं सद्गुरु के लक्षण कहता हूँ जिनके बैन = वचन बड़े मधुर एवं विनोदी आनंद  को देने वाले हैं । एवं चार वेदों (ऋग्वेद , सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद ) (षठ) छह शास्त्र और 18 पुराणो का उस परमेश्वर की महिमा का वर्णन करते हुए सार विलास मात्र में कह दिया नेति-नेति कहकर थक जाते हैं ।

गरीब  सद्गुरु के लक्षण कहूँ , अचल बिहंगम चाल ।
हम अमरापुर ले गया ज्ञान शब्द रस घाल ।। १८ ||

अर्थ---महाराज जी कहते हैं की मैं  सद्गुरु जी के लक्षणों  का वर्णन करता हूँ जिसको जानकार सद्गुरु परमात्मा की पहचान हो सके । वह सद्गुरु परमात्मा अचल = स्थिर हैं चलायमान नहीं होता और चल भी हैं । अर्थात निराकार भी हैं और साकार भी हैं । सामान्य विशेष सर्व स्वरूप हैं । वह सद्गुरु हमको अमरापुरी (सतलोक) में ले गए और ज्ञान शब्द रुपी बाण मारकर "घाल" या घायल करके अज्ञान का नाश कर दिया ।

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